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Ajay Malik -

Ajay Malik Jat Samaj pride

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Sonipat - Haryana

हरियाणा के गोहाना के छोटे से गाँव मदीना के अजय मलिक की कहानी हर घर में सुनाई जानी चाहिए, लोगों को जानना चाहिए कि कैसे सेना के एक सेवानिवृत्त सूबेदार के बेटे ने गरीबी और विपरीत परिस्थितियों से लड़कर नेशनल चैंपियन बनने का सफर तय किया। अजय ने साबित कर दिया कि साधनों और सुविधाओं की कमी उनकी राह में रोड़ा नहीं बन सकती, जो दृण निश्चय के साथ अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ते हैं। अजय खेतों में बने मिट्टी के साधारण कोर्ट पर प्रैक्टिस करने वाले अंडर-14 नैशनल टेनिस चैंपियन बन गए हैं। DLTA कॉम्प्लेक्स में हाल ही में खत्म हुई चैंपियनशिप में उन्होंने बॉयज़ सिंगल्स खिताब जीतकर सभी को चौंका दिया है। अजय के पिता अजमेर मलिक, भारतीय सेना में सूबेदार थे और सेवानिवृत्त हो चुके हैं, उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो अपने बच्चे को मैच के दौरान एनर्जी ड्रिंक और अन्य खाद्य सामग्री दे सकें, चैंपियनशिप के मैचों के दौरान उमस भरी गर्मी में जहाँ विपक्षी खिलाड़ी एनर्जी ड्रिंक पी रहे थे, अजय केवल सादा पानी पीकर खुद को मैच के काबिल बनाए हुए थे। पक्के इरादों वाले अजय ने इसकी परवाह किए बगैर खिताबी जीत का सफर तय किया। अजय को कोचिंग देना का ज़िम्मा सोमबीर मलिक ने उठाया, जिन्होंने खुद टीवी के माध्यम से इस खेल को सीखा है। अजय की ट्रेनिंग बिल्कुल देसी अंदाज़ में हुई, एक ऐसे युग में जहां चैंपियन बनने और बनाने के लिए वैज्ञानिक तकनीक का सहारा लिया जाता है, अजय ने मिट्टी के कोर्ट से प्रैक्टिस कर के सफलता प्राप्त की। उनके पिता गोहाना में नेताजी सुभाष चंद्र बोस संस्थान नाम से ‘देसी’ टेनिस अकैडमी चलाते हैं। रिटायरमेंट पर मिले पैसों में 3 लाख रुपये उन्होंने अपने बेटे के लिए कोर्ट तैयार करवाने में खर्च कर दिए। मिट्टी के इस कोर्ट में नेट को बांधने के लिए बिजली के दो पोल का सहारा लिया गया है। कोर्ट की लाइन के लिए लाइम पाउडर इस्तेमाल नहीं होता, खर्च बचाने के लिए नाइलोन की रस्सियों का इस्तेमाल किया गया। यहाँ जिम नहीं है, अलग-अलग वज़न के टायर रखे हुए हैं, जिन्हें बाँधकर अजय दौड़ा करते हैं और अपने पैरों और बाजुओं की ताकत बढ़ाते हैं। स्विस स्टार रोजर फेडरर को अपना आदर्श मानने वाले अजय के पिता ने बताया कि उनके बेटे के पास केवल दो रैकेट हैं, फाइनल से पहले उनके एक रैकेट की तार भी टूट गई थी। मलिक ने कहा कि तार ठीक करवाने का खर्च 800 रुपये था लेकिन उस समय उनकी जेब में सिर्फ 300 रुपये थे। अगर वो पैसे खर्च कर देते तो फिर दिल्ली से वापस गाँव जाना भी मुश्किल हो जाता, ऐसे में उन्होंने सबकुछ ऊपर वाले पर छोड़ दिया। मैच के दौरान वो बस यही दुआ कर रहे थे कि अजय का दूसरा रैकेट सही सलामत रहे। रैकेट ही नहीं अजय के पास जूते भी सिर्फ दो जोड़ी हैं, जो टेनिस खेलने लायक नहीं हैं एक जोड़ी जूते पहनकर वह प्रैक्टिस करते हैं और दूसरी जोड़ी को टूर्नमेंट्स के दौरान पहनते हैं। इतनी दिक्कतों और रोड़ों के बावजूद अजय ने बेहतरीन खेल दिखाया और नेशनल लेवल चैंपियन बन गए। जाट समाज टीम उनकी सफलता की प्रशंसा करती है और हम अजय के उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं। अजय जैसे होनहार खिलाड़ी ही देश में खेलों को नई परिभाषा दे रहे हैं।

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